विष्णु के आंसु

विष्णु के आंसु

वैतरणी के भीड़भाड़ वाले जीवात्माघाट पर पहूंचना तो सरल था. सामने भी तो बहुत सारे घाट दिखाई देते थे. मुझे यमदूत ने कहा भी कि सब से नज़दीक का घाट पुनर्जन्म का है और बहाव की दिशा में सीधे नर्क के घाट हैं – इसलिए बहाव में न बह जाना ही अच्छा है.  मुझे भी अनेक जीवों की तरह धक्का लगा दिया गया.

वैतरणी की भयंकरता के बारे में सुना तो था. वैतरणी का जल इतना मटमैला था कि अंदर “पैर” रखने पर “पैर” दिखना बंद हो जाये. कुछ कदम अंदर जाने के बाद अचानक से गहराई आयी और मैं बड़े से भंवर में फँस गया.  सारा ज़ोर लगा के मैं छूटा. और आगे तैरते फ़िर और अधिक बलवान भंवर आया! मेरी आसपास के जीव डूबते जा रहे थे.  मुझे लग रहा था कि मैं भी अब लंबा नहीं खिंच पाऊँगा.

तब मुझे याद आया विष्णु का नाम! जब तक मैं पूरा “विष्णु” ऐसा बोल रहूँ तब तक में तो पैरों के नीचे आधार आ गया! एक बार स्थिर होने के बाद में मैं पैर घूमा के दूसरा आधार खोजने लगा – फ़िर तीसरा – ऐसा करते करते दूसरे किनारे पर, दूर के घाट तक जा पहूँचा. वहाँ लिखा था “वैकुंठ घाट”! यथा नाम तथा गुण, इस घाट पर कोई भीड़, कोई कुंठा न थीं.

***

मुझे तो कल्पना भी न थी कि स्वयं विष्णु के दर्शन होंगे! विष्णु धीरगंभीर खड़े थे.

“धन्य हो विष्णु! आपके नाम के एक बार मात्र के स्मरण से वैतरणी के तल से पथ्थर फूटे! मेरे जैसे क्षुद्र जीव को आपके और सच्चे वैष्णवों के दर्शन का मौक़ा मिला!” मुझमें से स्तुति फूट निकली!

विष्णु की आंखों में करुणामय उपालंभ दिखा. वे बोले: “मूढमति! वे पथ्थर नहीं हैं! वे तो सच्चे वैष्णव हैं. उन्होंने वैकुंठ छोड़ के उस कुंठा भरी वैतरणी में कछुओं का अवतार मांगा है. जो विष्णु का नाम लेते हैं उन्हे तारने को दौड़ते हैं.” विष्णु की आवाज़ भर आई.

“हे विष्णु! तो आपके नाम का ऐसा मोह क्यूँ? सारे जीव क्यूँ नहीं तैराये जाते?”

“मुझे तो तारना है! पर न दिखते कछुए बन कर वैतरणी में रहना चाहने वाले इतने वैष्णव कहाँ हैं?” इतना बोलते बोलते विष्णु के लोचनकमल में से छलक-छलक आंसु बह चले.

मुझसे वैतरणी तो पार हो गई पर विष्णु के आंसु पार न हो पाये.

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ग़र भारत को ललकारा है

(लिखा तारीख: फ़रवरी १८, १९९२)

घर घर से उठेगी सेना

चील बन कर लड़ेगी मैना

ग़र भारत को ललकारा है

कायरता की शांत निंद से रक्तकृपाण अहिंसक है

कोटि मृत्यु से एक कायरता कहीं अधिक विध्वंसक है

यवनों और हूणों इन ही हाथों से हटाया है                                                          चील.

कणकण से यहाँ कृष्ण बनेंगे, राम बनेगा रोमरोम से

नरनर में नृसिंह उभरेगा, परशुराम पदपथ्थर से

केवल यहाँ पर वीर नर ने ही तो पूज्य पद पाया है                                  चील.

माना भारत की नारी के हाथ चूड़ियों में बंदी है

पर उन हाथों में दुष्टविनाश की परम अभीप्सा अंधी है

कितने युगों से भक्त यहाँ पर दशप्रहरिणी को पूजता है                         चील.

कौन कहता है साथ हमारे बनी नहीं कभी एकता है

हर रावण के सामने यहाँ का भालू वानर भी लड़ता है

महादेव बैठा स्मशान में जिसने मृत्यु को डराया है                                 चील.

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मरने चले हैं

(लिखा तारीख: सितम्बर ०७, १९९०)

(राग: माँड)

(ताल: दीपचंदी)

आप पे हम तो मरने चले हैं

पूछते हैं लोग “क्या करने चले हैं?”

कभी हमें प्यार के काबिल न समझा

हमें तो शिकार ख़ुद को क़ातिल समझा

जानते हुए सर हम धरने चले हैं

न मिलने की ख़ुशी न बिछ्ड़ने का ग़म है

देखा हमें आपने यह भी क्या कम है?

आपके स्मरण क्या बिसरने चले हैं?

आँसू बहाये आँखों से अपनी

रो के सजा दीं राहें – आप तो

कहते हो “क्या ख़ूब झरने चले हैं!”

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कहीं ट्रेन जली फ़िर घर जले

(कहीं तो कुछ बूरा हुआ – न तो ट्रेन को जलना था, न ही तो घरों को. नतीजन फ़ायदा तो दोनों के सौदागरों ने उठाया है.)

कहीं ट्रेन जली फ़िर घर जले

कितने इन्साँ मर जले

ग़म इतना है उपरवाले

ये तेरे नामों पर जले

दिल पर लगती है चोट जभी इन

मासूमों को देखता हूँ

हाय क्यूँ नहीं इन दंगों में वो

मौत के सौदागर जले?

पेट से जोड़ा दिल से सील दे

उपरवाले कहता हूँ

इससे पहले के इन दंगों में

कहीं ख़ुद तेरा घर जले

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दोनों चले गये – हास्य रस

(लिखा तारीख: अक्तूबर ०३, १९९५)

होली चंदे को हलाल कर दोनों चले गये

काँटो भरे सवाल पर दोनों चले गये

बजता रहा मुहब्बत का मल्हार दिलरूबा पर

थूक के सूर-ताल पर दोनों चले गये

राहे वफ़ा गुज़रती थी कोह-ओ-जंगल के बीच

पहनी गैंड़े की खाल पर दोनों चले गये

माँगने पर मिलता नहीं हमें तो उधार

और मुफ़्त के माल पर दोनों चले गये

ऐसी हुई धमाल पर दोनों चले गये

ऐसा मचा बवाल पर दोनों चले गये

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दोनों चले गये – शृंगार रस

(लिखा तारीख: अक्तूबर ०३, १९९५)

उड़ते होली गुलाल पर दोनों चले गये

मख़मली रूमाल पर दोनों चले गये

बजता रहा मुहब्बत का मल्हार दिलरूबा पर

ग़ैनों के जमाल पर दोनों चले गये

राहे वफ़ा गुज़रती थी कोह-ओ-जंगल के बीच

झिंगुरों के ताल पर दोनों चले गये

ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलती दुनिया में दोस्ती

क़ाफ़ी शक़ी सवाल पर दोनों चले गये

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दोनों चले गये – करुण रस

(लिखा तारीख: अप्रैल ०७, १९९४)

जलती होली की राख पर दोनों चले गये

काँटो भरी वह शाख पर दोनों चले गये

बजता रहा मुहब्बत का मल्हार दिलरूबा पर

जलते हुए बैसाख पर दोनों चले गये

राहे वफ़ा गुज़रती थी कोह-ओ-जंगल के बीच

ज्वालामुखी सुराख़ पर दोनों चले गये

मिलती नहीं है दुनिया में ढूँढ़ने पर भी दोस्ती

दुश्मन भरे थे लाख, पर दोनों चले गये

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